कवि से परिचय
इस कविता को हिदी के प्र ं सिद्ध कवियों में से एक
सोहनलाल द्विवेदी जी ने लिखा है। उनका जन्म आज
से लगभग सवा सौ साल पहले हुआ था। उस समय
अग्ं रेजों का भारत पर आधिपत्य था। उन्होंने अपनी लेखनी से
अग्ं रेज़ों का विरोध किया। उनकी लेखनी का सबसे प्रिय विषय
था ‘देशभक्ति’। भारत के गौरव का गान करना उन्हें बहु
त प्रिय था। उनकी कुछ
और चर्चित रचनाएँ हैं— ‘बढ़े चलो, बढ़े चलो’, ‘कोशिश करने वालों की हार
नहीं होती’ आदि।
सोहनलाल वििेदी (1906–1988) को वहंदी सावहत्य में ‘िाष्ट्रीय कवि’ के रूप में जाना जाता है। उनकी कविताओं ने स्वतंिता संग्राम के द िान जन-मानस में नई ऊजात का संचाि वकया।
* ज: 1906, उत्ति प्रदेश (वबंदकी, फतेहपुि)।
* लेखन शैली: सिल, प्रिाहपूणत औि ओजपूणत भाषा। िे कवठन से कवठन भाि को सहज शब्दों में व्यि किने में वनपुण र्े।
* मुख्य विषय: िाष्ट्रभक्ति, गांधीिादी दशतन औि समाज सेिा।
* प्रवसद्ध िचनाएाँ: ‘बढे चलो, बढे चलो’, ‘कुणाल’, ‘दूध बताशा’ (बाल कविताएाँ) औि ‘कोवशश किने िालों की हाि नहीं होती’।
* मूल्ांकन: वििेदी जी का सावहत्य छािों में ‘िीि’ औि ‘शांत’ िस के माध्यम से िाष्ट्र के प्रवत समपतण भाि जागृत किता है।
उनकी इसी िाष्ट्रिादी दृवष्ट् का जीिंत प्रमाण है कविता ‘मातृभूवम’, वजसे हम इसकी मूल िततनी में यहााँ प्रस्तुत कि िहे हैं।